बाल विवाह मुक्त मध्यप्रदेश की दिशा में बड़ा कदम, 35 हजार से अधिक अधिकारी संभालेंगे जिम्मेदारी

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हॉटस्पॉट क्षेत्रों की पहचान कर होगी लक्षित कार्रवाई, प्रशासन अकादमी में राज्य स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला

भोपाल। मध्यप्रदेश में बाल विवाह की रोकथाम को लेकर राज्य सरकार ने मैदानी स्तर पर निगरानी और त्वरित कार्रवाई के लिए व्यापक तंत्र तैयार किया है। प्रदेश में 35 हजार से अधिक बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों (CMPOs) को विभिन्न स्तरों पर जिम्मेदारी सौंपी गई है। अब बाल विवाह की घटनाओं वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर उपलब्ध आंकड़ों और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर लक्षित कार्रवाई पर जोर दिया जाएगा।

भोपाल स्थित प्रशासन अकादमी में आयोजित एक दिवसीय राज्य स्तरीय प्रशिक्षण कार्यशाला में बाल विवाह की रोकथाम, कानून के प्रभावी क्रियान्वयन, अधिकारियों की जिम्मेदारियों तथा विभिन्न विभागों के बीच बेहतर समन्वय को लेकर विस्तार से चर्चा हुई।

शासन, प्रशासन और समाज को मिलकर करना होगा प्रयास

महिला एवं बाल विकास मंत्री सुश्री निर्मला भूरिया ने कहा कि बाल विवाह मुक्त मध्यप्रदेश की परिकल्पना को साकार करने के लिए शासन, प्रशासन और समाज को मिलकर प्रभावी एवं समन्वित प्रयास करने होंगे।

उन्होंने कहा कि बाल विवाह को केवल सामाजिक कुरीति के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। इसका सीधा असर बालिकाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन के अधिकारों पर पड़ता है। ऐसे में बाल विवाह रोकने के लिए कानून के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता और संवेदनशील हस्तक्षेप भी जरूरी है।

मंत्री ने कहा कि बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारियों की भूमिका केवल कानून लागू करने तक सीमित नहीं है। वे अपने-अपने क्षेत्रों में सामाजिक बदलाव के महत्वपूर्ण माध्यम हैं। अधिकारियों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बाल विवाह की सूचना मिलने पर तत्काल कार्रवाई हो और मामला प्रशासन के किसी दूरस्थ स्तर तक पहुंचने का इंतजार न करे।

35 हजार से ज्यादा अधिकारियों का मैदानी नेटवर्क

प्रदेश में 35 हजार से अधिक CMPOs को जिला स्तर से लेकर अनुभाग, तहसील, विकासखंड, सेक्टर, ग्राम और नगरीय क्षेत्रों तक जिम्मेदारियां दी गई हैं। इस व्यवस्था का उद्देश्य बाल विवाह की संभावित घटनाओं की स्थानीय स्तर पर पहचान करना और समय रहते हस्तक्षेप सुनिश्चित करना है।

प्रशिक्षण में अधिकारियों को बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 (PCMA) के प्रभावी क्रियान्वयन के साथ ही बाल विवाह के मामलों में समयबद्ध और संवेदनशील कार्रवाई के संबंध में जानकारी दी गई।

बाल विवाह के हॉटस्पॉट क्षेत्रों पर विशेष निगरानी

महिला एवं बाल विकास विभाग के आयुक्त संदीप जी.आर. ने कहा कि अब बाल विवाह रोकथाम के लिए सामान्य जागरूकता गतिविधियों के साथ-साथ हॉटस्पॉट आधारित रणनीति अपनाने की जरूरत है।

जिन ग्राम पंचायतों, विकासखंडों और जिलों में बाल विवाह के मामले अपेक्षाकृत अधिक सामने आते हैं, वहां उपलब्ध आंकड़ों और स्थानीय परिस्थितियों का विश्लेषण कर योजनाबद्ध कार्रवाई की जाएगी। इससे सीमित संसाधनों का उपयोग उन क्षेत्रों में अधिक प्रभावी ढंग से किया जा सकेगा, जहां जोखिम ज्यादा है।

उन्होंने कहा कि महिला एवं बाल विकास विभाग के साथ राजस्व, पंचायत एवं ग्रामीण विकास, नगरीय विकास एवं आवास विभाग की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। बाल विवाह की रोकथाम में पुलिस और जिला प्रशासन के सक्रिय सहयोग को भी आवश्यक बताया गया।

‘बाल विवाह मुक्त ग्राम’ पहल को मिलेगा बढ़ावा

मंत्री निर्मला भूरिया ने ‘बाल विवाह मुक्त ग्राम’ पहल को गति देने पर भी जोर दिया। इस पहल के अंतर्गत ऐसे गांवों को मान्यता देने की व्यवस्था है, जहां पिछले एक वर्ष में कोई बाल विवाह नहीं हुआ है।

इस पहल का उद्देश्य सिर्फ बाल विवाह की एक घटना को रोकना नहीं, बल्कि पूरे गांव और समुदाय को बच्चों के अधिकारों तथा उनके सुरक्षित भविष्य के प्रति जागरूक करना है।

किशोरियों के सशक्तिकरण पर जोर

बाल विवाह की रोकथाम के लिए किशोरियों को शिक्षा से जोड़कर रखना और उन्हें अपने जीवन से जुड़े फैसलों के लिए सक्षम बनाना भी महत्वपूर्ण माना गया। प्रशिक्षण में जीवन कौशल शिक्षा, स्वास्थ्य जागरूकता, डिजिटल साक्षरता और नेतृत्व विकास जैसे विषयों को भी महत्वपूर्ण बताया गया।

यूनिसेफ के राज्य प्रमुख विलियम हेनलोन जूनियर ने कहा कि किशोरावस्था भविष्य निर्माण का महत्वपूर्ण चरण है। किशोर-किशोरियों का शिक्षा से जुड़े रहना, सुरक्षित वातावरण मिलना और जीवन कौशल हासिल करना बाल विवाह रोकने की दिशा में स्थायी बदलाव ला सकता है।

देवउठनी ग्यारस से पहले बढ़ाई जाएगी सतर्कता

मंत्री ने अधिकारियों से देवउठनी ग्यारस जैसे अवसरों को देखते हुए बाल विवाह की रोकथाम के लिए पहले से तैयारी तेज करने को कहा। उन्होंने अधिकारियों को निर्देशित किया कि बाल विवाह के जोखिम वाले परिवारों तक केवल कानूनी कार्रवाई के नजरिये से न पहुंचें, बल्कि संवेदनशीलता और सहानुभूति के साथ संवाद करें।

प्रशासन के अनुसार गरीबी, सामाजिक दबाव, असुरक्षा और अवसरों की कमी जैसे कारण भी कई परिवारों को बाल विवाह की ओर धकेल सकते हैं। इसलिए कानून के साथ परामर्श, शिक्षा, सामाजिक सहयोग और आजीविका से जुड़े अवसर उपलब्ध कराने पर भी ध्यान देना जरूरी है।

पंचायतों और पुलिस की भूमिका भी महत्वपूर्ण

पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग के संचालक छोटे सिंह ने कहा कि पंचायतों की जिम्मेदारी केवल विकास कार्यों तक सीमित नहीं है। ग्राम पंचायतों और ग्राम सभाओं में बाल विवाह की रोकथाम को सामाजिक मुद्दे के रूप में प्रमुखता से उठाया जाना चाहिए।

वहीं विशेष पुलिस महानिदेशक अनिल कुमार ने बाल विवाह रोकथाम अधिकारियों की नियमित समीक्षा और उनकी जिम्मेदारियां स्पष्ट करने पर जोर दिया। उन्होंने प्रत्येक ब्लॉक और क्षेत्र में बाल विवाह रोकने के लिए निरंतर निगरानी की आवश्यकता बताई।

NFHS के आंकड़ों में कमी का दावा

कार्यशाला में मंत्री ने राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-6 (NFHS-6) के आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि 20 से 24 वर्ष की महिलाओं में 18 वर्ष से कम आयु में विवाह का अनुपात NFHS-5 के 23.1 प्रतिशत से घटकर 20 प्रतिशत हुआ है। उन्होंने कहा कि केंद्र के ‘बाल विवाह मुक्त भारत अभियान’ से बाल विवाह उन्मूलन को राष्ट्रीय प्राथमिकता मिली है और मध्यप्रदेश में भी इसे लेकर समन्वित प्रयासों को मजबूत किया जा रहा है।

मार्गदर्शिका और प्रशिक्षण मॉड्यूल का विमोचन

कार्यक्रम के दौरान मंत्री निर्मला भूरिया ने यूनिसेफ द्वारा बाल विवाह की प्रभावी रोकथाम से संबंधित मार्गदर्शिका और प्रशिक्षण मॉड्यूल का विमोचन किया। परिसर में लगाई गई प्रदर्शनी का अवलोकन भी किया गया।

कार्यक्रम में यंग चैम्पियंस हुमा खान और आशु सुंदरी ने भी अपने अनुभव साझा किए।

राज्य सरकार की इस रणनीति में कानून के सख्त पालन के साथ स्थानीय स्तर पर निगरानी, हॉटस्पॉट की पहचान, विभागीय समन्वय और सामाजिक जागरूकता को एक साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसका उद्देश्य बाल विवाह की घटनाओं को रोकने के साथ-साथ बच्चों, विशेषकर बालिकाओं को शिक्षा, सुरक्षा और बेहतर भविष्य के अवसर उपलब्ध कराना है।

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