नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण से जुड़ी समस्या नहीं रह गया है, बल्कि यह लोगों के स्वास्थ्य और जीवन की गुणवत्ता के लिए भी गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। दुनिया के कई हिस्सों में बढ़ता तापमान, वायु प्रदूषण और मौसम की चरम घटनाएं आम लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। ऐसे में जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बनाई जाने वाली सरकारी योजनाओं में पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ स्वास्थ्य सुरक्षा को भी प्राथमिकता देना आवश्यक हो गया है।
इसी मुद्दे पर जारी 2026 हेल्दी एनडीसी स्कोरकार्ड में भारत का प्रदर्शन काफी कमजोर बताया गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, इस वैश्विक आकलन में भारत को कुल 32 में से केवल 2 अंक मिले हैं। जापान को भी इतने ही अंक प्राप्त हुए हैं। यह मूल्यांकन इस बात पर केंद्रित है कि अलग-अलग देश अपने जलवायु संबंधी लक्ष्यों और राष्ट्रीय योजनाओं में लोगों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को कितनी अहमियत देते हैं।
जलवायु नीतियों में स्वास्थ्य को शामिल करना क्यों जरूरी?
जलवायु परिवर्तन का प्रभाव केवल जंगलों, नदियों, खेती या प्राकृतिक संसाधनों तक सीमित नहीं है। इसका असर सीधे मानव शरीर और सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। लंबे समय तक अत्यधिक गर्मी में रहने से शरीर में पानी की कमी, हीट स्ट्रोक और दूसरी गर्मी से जुड़ी बीमारियों का जोखिम बढ़ सकता है। बुजुर्गों, छोटे बच्चों, गर्भवती महिलाओं और पहले से स्वास्थ्य समस्याओं से जूझ रहे लोगों पर इसका प्रभाव अधिक गंभीर हो सकता है।
इसी तरह, प्रदूषित हवा में मौजूद सूक्ष्म कण और अन्य हानिकारक तत्व सांस संबंधी परेशानियों को बढ़ा सकते हैं। दमा से पीड़ित लोगों और बच्चों के लिए खराब वायु गुणवत्ता विशेष रूप से चिंता का विषय है। तापमान और बारिश के बदलते स्वरूप से कुछ क्षेत्रों में मच्छरों तथा अन्य रोग फैलाने वाले जीवों के पनपने की परिस्थितियां भी बदल सकती हैं।
इन चुनौतियों को देखते हुए जलवायु नीतियों में स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों की पहचान, समय रहते चेतावनी देने वाली व्यवस्थाओं और अस्पतालों की तैयारी को शामिल करना महत्वपूर्ण है।
भारत के कम स्कोर का क्या मतलब है?
हेल्दी एनडीसी स्कोरकार्ड का उद्देश्य यह देखना है कि देश अपने राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित जलवायु योगदान यानी एनडीसी में स्वास्थ्य को किस तरह शामिल करते हैं। एनडीसी वे राष्ट्रीय प्रतिबद्धताएं हैं, जिनके माध्यम से देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए अपने लक्ष्य और योजनाएं प्रस्तुत करते हैं।
भारत को 32 में से 2 अंक मिलने का अर्थ है कि इस आकलन के निर्धारित मानकों के अनुसार स्वास्थ्य संबंधी पहलुओं को जलवायु प्रतिबद्धताओं में शामिल करने के मामले में सुधार की काफी गुंजाइश है। हालांकि, इस स्कोर को भारत के संपूर्ण स्वास्थ्य तंत्र, पर्यावरणीय प्रयासों या जलवायु नीति का अकेला मापदंड नहीं माना जाना चाहिए। इसका सही अर्थ समझने के लिए रिपोर्ट के विस्तृत मानकों और मूल्यांकन पद्धति को देखना आवश्यक है।
यह आकलन इस बात पर भी ध्यान दिलाता है कि उत्सर्जन कम करने के लक्ष्य तय करना ही पर्याप्त नहीं है। नीतियों में यह स्पष्ट होना चाहिए कि जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न स्वास्थ्य जोखिमों को कैसे कम किया जाएगा और प्रभावित समुदायों तक सुरक्षा तथा चिकित्सा सुविधाएं कैसे पहुंचाई जाएंगी।
आम लोगों की सेहत पर पड़ सकता है सीधा असर
भारत जैसे विशाल और विविध जलवायु वाले देश में गर्मी की लहरें, वायु प्रदूषण, बाढ़ और अन्य मौसमी घटनाएं अलग-अलग क्षेत्रों में अलग प्रकार की चुनौतियां पैदा कर सकती हैं। शहरी इलाकों में कंक्रीट की इमारतों और सीमित हरित क्षेत्रों के कारण गर्मी का प्रभाव अधिक महसूस हो सकता है। वहीं, बाढ़ या अत्यधिक बारिश से प्रभावित क्षेत्रों में स्वच्छ पेयजल, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच बाधित होने का खतरा रहता है।
ऐसी परिस्थितियों में स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करना, गर्मी से बचाव के लिए जन-जागरूकता बढ़ाना, प्रदूषण की निगरानी करना और आपदा के समय चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी है। कार्यस्थलों पर गर्मी से सुरक्षा, स्कूलों में जागरूकता और संवेदनशील आबादी के लिए समय पर चेतावनी जैसी पहलें भी उपयोगी हो सकती हैं।
जलवायु योजनाओं में किन कदमों पर जोर होना चाहिए?
जलवायु परिवर्तन से होने वाले स्वास्थ्य नुकसान को कम करने के लिए सरकारों को कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। इनमें स्वास्थ्य सेवाओं को जलवायु संबंधी आपदाओं के लिए तैयार करना, अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों की बिजली तथा पानी की उपलब्धता मजबूत बनाना, गर्मी और प्रदूषण से जुड़े खतरों की निगरानी करना और लोगों को समय पर सही जानकारी देना शामिल है।
इसके अलावा, स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने, सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने, शहरों में हरित क्षेत्रों का विस्तार करने और प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों को नियंत्रित करने जैसे कदम पर्यावरण के साथ-साथ जनस्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी हो सकते हैं। इन प्रयासों का लाभ तभी व्यापक होगा, जब योजनाओं में स्पष्ट लक्ष्य, समयसीमा और प्रगति मापने की व्यवस्था भी शामिल हो।
COP31 से पहले बढ़ा जलवायु और स्वास्थ्य पर ध्यान
यह आकलन नवंबर 2026 में प्रस्तावित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन COP31 से पहले सामने आया है। ऐसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों में देशों के लिए जलवायु कार्रवाई, वित्तीय सहायता, अनुकूलन और उत्सर्जन में कमी जैसे मुद्दों पर चर्चा का अवसर होता है।
जलवायु परिवर्तन और स्वास्थ्य के बीच संबंध को अधिक महत्व देना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। विशेषज्ञों और नीति निर्माताओं के सामने चुनौती यह है कि जलवायु संबंधी प्रतिबद्धताओं को ऐसे ठोस उपायों में बदला जाए, जिनसे लोगों की सेहत की रक्षा हो और स्वास्थ्य व्यवस्था बदलते मौसम के प्रभावों का सामना करने में सक्षम बने।
निष्कर्ष: भारत का स्कोर जलवायु नीतियों में स्वास्थ्य सुरक्षा को अधिक प्रभावी ढंग से शामिल करने की आवश्यकता की ओर ध्यान खींचता है। भविष्य की योजनाओं में प्रदूषण नियंत्रण और उत्सर्जन में कमी के साथ गर्मी, चरम मौसम और जलवायु से जुड़े रोगों के जोखिमों को कम करने के उपाय भी स्पष्ट होने चाहिए। इससे जलवायु कार्रवाई का लाभ पर्यावरण के साथ-साथ आम नागरिकों के स्वास्थ्य तक पहुंच सकेगा।







