भारत की बेहद दुर्लभ और गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षी प्रजाति ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) के संरक्षण अभियान में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि सामने आई है। राजस्थान के जैसलमेर स्थित डेजर्ट नेशनल पार्क में कैप्टिव ब्रीडिंग के जरिए तैयार किए गए दो नर ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को प्राकृतिक वातावरण में छोड़ा गया। इस कदम को देश में चल रहे बस्टर्ड संरक्षण कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ माना जा रहा है।
इस अवसर पर केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेंद्र यादव ने संरक्षण अभियान से जुड़े वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और ग्राउंड स्टाफ के वर्षों के प्रयासों की सराहना की। उन्होंने विशेष रूप से डॉ. सुतीर्थ दत्ता, डॉ. तुषना करकरिया और ऋषिका शर्मा की मेहनत का उल्लेख किया।
वैज्ञानिकों की मेहनत को किया सलाम
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को जंगल में वापस छोड़ने के दौरान वैज्ञानिकों की भावुक प्रतिक्रिया ने भी सभी का ध्यान खींचा। भूपेंद्र यादव ने कहा कि इस परियोजना को सफल बनाने में वैज्ञानिकों और पूरी टीम ने लंबे समय तक समर्पित होकर काम किया है।
उन्होंने डॉ. सुतीर्थ दत्ता, डॉ. तुषना करकरिया और ऋषिका शर्मा सहित पूरी टीम की प्रतिबद्धता की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के संरक्षण प्रयासों के लिए प्रशंसा के शब्द भी कम पड़ जाते हैं।
करीब एक दशक की मेहनत के बाद मिला अहम परिणाम
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड संरक्षण कार्यक्रम पर वर्षों से वैज्ञानिक स्तर पर काम किया जा रहा है। इसका उद्देश्य केवल पक्षियों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें भविष्य में उनके प्राकृतिक आवास में दोबारा स्थापित करना भी है।
वन्यजीव विज्ञान संस्थान और संबंधित एजेंसियों की मदद से ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के अंडों को संरक्षित वातावरण में सेया गया और उनसे निकले चूजों की वैज्ञानिक तरीके से देखभाल की गई। समय के साथ कैप्टिव ब्रीडिंग कार्यक्रम ने ऐसे पक्षियों की संख्या बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पहली बार कैप्टिव-ब्रेड पक्षियों को जंगल में छोड़ने की दिशा में कदम
जैसलमेर में दो नर GIB को छोड़ा जाना संरक्षण कार्यक्रम के अगले चरण की शुरुआत माना जा रहा है। इसका उद्देश्य कैप्टिव ब्रीडिंग से तैयार पक्षियों को धीरे-धीरे उनके प्राकृतिक पर्यावास में स्थापित करना है।
सरकार के अनुसार, जंगल में छोड़े गए पक्षियों की गतिविधियों और उनके व्यवहार से प्राप्त जानकारी के आधार पर भविष्य में और पक्षियों को प्राकृतिक आवास में छोड़ने की प्रक्रिया को बेहतर बनाया जाएगा।
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के अस्तित्व पर गंभीर संकट
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड भारत के सबसे संकटग्रस्त पक्षियों में शामिल है। यह मुख्य रूप से राजस्थान और गुजरात समेत कुछ सीमित क्षेत्रों के खुले घास एवं शुष्क भू-दृश्यों में पाया जाता है। इसके सामने आवास का लगातार सिकुड़ना और अन्य मानवीय गतिविधियों से जुड़े खतरे बड़ी चुनौतियां हैं।
इसी वजह से इसके संरक्षण के लिए कंजर्वेशन ब्रीडिंग, आवास सुधार और वैज्ञानिक निगरानी जैसे उपायों को एक साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। Wildlife Institute of India की रिपोर्ट के अनुसार, बस्टर्ड रिकवरी कार्यक्रम का व्यापक उद्देश्य वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर इस प्रजाति की आबादी को पुनर्जीवित करना और उसके आवास को बेहतर बनाना है।
संरक्षण अभियान में कई संस्थाएं साथ
ग्रेट इंडियन बस्टर्ड रिकवरी कार्यक्रम में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय, राजस्थान वन विभाग और Wildlife Institute of India समेत कई संस्थाएं सहयोग कर रही हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी तकनीकी सहयोग उपलब्ध कराया जा रहा है, जबकि परियोजना को National CAMPA के माध्यम से वित्तीय सहायता मिली है।
भूपेंद्र यादव ने इस उपलब्धि को वैज्ञानिकों, शोधकर्ताओं और फील्ड स्टाफ की लगभग एक दशक लंबी मेहनत का परिणाम बताया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन और समर्थन के लिए भी आभार जताया।
संरक्षण की नई उम्मीद
जैसलमेर के रेगिस्तान में दो ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को वापस प्राकृतिक वातावरण में छोड़ना भले ही संख्या के लिहाज से छोटा कदम दिखाई दे, लेकिन संरक्षण विज्ञान के नजरिए से इसका महत्व काफी बड़ा है। आने वाले समय में इन पक्षियों की निगरानी से यह समझने में मदद मिलेगी कि कैप्टिव-ब्रेड GIB प्राकृतिक परिस्थितियों में किस तरह अनुकूलन करते हैं।
यदि यह प्रक्रिया सफल रहती है, तो भविष्य में और कैप्टिव-ब्रेड ग्रेट इंडियन बस्टर्ड को जंगल में छोड़े जाने का रास्ता मजबूत हो सकता है। इससे भारत की इस दुर्लभ पक्षी प्रजाति के दीर्घकालिक संरक्षण की उम्मीद और बढ़ेगी।








