संसद के कामकाज को अधिक व्यवस्थित तरीके से आगे बढ़ाने के लिए कई महत्वपूर्ण स्थायी समितियों का पुनर्गठन किया गया है। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने संसद की विभिन्न स्थायी समितियों की नई संरचना को मंजूरी दी है। समिति स्तर पर किए गए इन बदलावों के बाद अब नई गठित समितियां अपने-अपने निर्धारित विषयों और मंत्रालयों से जुड़े मामलों की समीक्षा करेंगी।
नई समितियों का गठन 26 सितंबर 2026 से प्रभावी माना गया है। संसदीय समितियां संसद के कामकाज का अहम हिस्सा होती हैं और इनके माध्यम से विभिन्न मंत्रालयों की नीतियों, योजनाओं, खर्च तथा कामकाज से जुड़े विषयों की विस्तृत पड़ताल की जाती है।
समितियों के पुनर्गठन की क्या है अहमियत?
संसद की स्थायी समितियां सदन में होने वाली चर्चाओं के साथ-साथ उन विषयों पर भी विस्तार से विचार करती हैं, जिन पर सदन में सीमित समय के कारण व्यापक चर्चा संभव नहीं हो पाती। समितियां संबंधित मंत्रालयों और विभागों से जानकारी मांग सकती हैं, अधिकारियों से जवाब ले सकती हैं और विभिन्न मुद्दों पर अपनी रिपोर्ट संसद के सामने रखती हैं।
इसी वजह से स्थायी समितियों में सदस्यों की नई जिम्मेदारियां तय होना संसदीय कामकाज की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जाता है। पुनर्गठन के बाद अलग-अलग समितियों में सांसदों की नई भूमिका और जिम्मेदारियां निर्धारित होंगी।
लोकसभा अध्यक्ष ने किया पुनर्गठन
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला संसद की कार्यप्रणाली से जुड़े महत्वपूर्ण निर्णयों में प्रमुख भूमिका निभाते हैं। इसी क्रम में कई महत्वपूर्ण स्थायी समितियों की संरचना में बदलाव किया गया है। नई व्यवस्था के तहत समितियां अब 26 सितंबर 2026 से प्रभावी मानी जाएंगी।
समितियों के पुनर्गठन का उद्देश्य संसदीय निगरानी और समीक्षा की प्रक्रिया को नियमित रूप से आगे बढ़ाना है। इन समितियों के माध्यम से मंत्रालयों के कामकाज से जुड़े विभिन्न विषयों पर सांसदों को विस्तार से विचार करने का अवसर मिलता है।
स्थायी समितियां क्यों महत्वपूर्ण हैं?
संसदीय समितियों को अक्सर संसद की विस्तृत जांच-पड़ताल व्यवस्था का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है। किसी मंत्रालय से जुड़े बजट, नीतिगत फैसले, योजनाओं के क्रियान्वयन और प्रशासनिक विषयों की समीक्षा में समितियों की भूमिका रहती है।
समिति की बैठकों में संबंधित विषयों पर चर्चा के अलावा जरूरत के अनुसार मंत्रालय के अधिकारियों और विशेषज्ञों से भी जानकारी ली जा सकती है। इसके बाद समिति अपने निष्कर्ष और सुझाव रिपोर्ट के रूप में संसद के समक्ष रखती है।
नई समितियां आगे क्या करेंगी?
पुनर्गठन के बाद संबंधित स्थायी समितियां अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र के अनुसार बैठकों और समीक्षा की प्रक्रिया आगे बढ़ाएंगी। इनके सामने आने वाले महत्वपूर्ण विधायी, प्रशासनिक और नीतिगत मुद्दों पर विचार किया जाएगा।
समितियों की रिपोर्ट सरकार और संसद के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ का काम करती हैं। हालांकि समिति की सिफारिशें अपने आप में कानून नहीं होतीं, लेकिन इनके माध्यम से सरकार के विभिन्न विभागों के कामकाज पर संसदीय निगरानी मजबूत होती है।
संसदीय निगरानी को मिलेगी नई दिशा
स्थायी समितियों का पुनर्गठन ऐसे समय में हुआ है जब संसद में विभिन्न नीतिगत और प्रशासनिक विषयों पर लगातार चर्चा होती रहती है। नई संरचना के साथ समितियों में शामिल सांसद अपने-अपने निर्धारित क्षेत्रों से जुड़े मुद्दों की समीक्षा करेंगे।
इस बदलाव से संसद की समिति प्रणाली को नए सिरे से सक्रिय करने और विभिन्न मंत्रालयों के कामकाज की गहराई से समीक्षा करने में मदद मिलने की उम्मीद है। 26 सितंबर 2026 से प्रभावी हुई नई व्यवस्था के तहत अब संबंधित समितियां अपनी निर्धारित जिम्मेदारियों के अनुसार काम आगे बढ़ाएंगी।








