चुनाव आयोग से जुड़े हालिया विवाद ने राजनीतिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। निर्वाचन प्रक्रिया और मतदाता सूची संशोधन से जुड़े मुद्दों पर सामने आई रिपोर्ट के बाद राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के कुछ सहयोगी दलों ने भी चुनाव आयोग से स्थिति स्पष्ट करने की मांग की है।
मामले ने तब तूल पकड़ा जब एक मीडिया रिपोर्ट में दावा किया गया कि चुनाव आयोग के दो आयुक्तों ने पिछले 10 महीनों के दौरान कई निर्णयों और आदेशों पर औपचारिक आपत्तियां दर्ज कराई थीं। रिपोर्ट के अनुसार, इन आपत्तियों का संबंध मतदाता सूची संशोधन, नए मतदाताओं के पंजीकरण, नाम हटाने और चुनावी डाटाबेस के संचालन जैसे मुद्दों से था।
सहयोगी दलों ने क्या कहा?
केंद्रीय मंत्री और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के प्रमुख चिराग पासवान ने कहा कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है और यदि उसके कामकाज को लेकर लोगों के मन में सवाल उठ रहे हैं तो आयोग को स्वयं आगे आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। उनका कहना था कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में जनता का भरोसा सबसे महत्वपूर्ण है और किसी भी तरह की शंका को दूर किया जाना चाहिए।
वहीं, राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने भी आयोग से तत्काल स्पष्टीकरण की जरूरत बताई। तेलुगु देशम पार्टी (टीडीपी) के लोकसभा नेता लावु श्रीकृष्ण देवरायलु ने कहा कि पारदर्शिता बढ़ने से संवैधानिक संस्थाओं में जनता का विश्वास और मजबूत होगा।
रिपोर्ट में क्या दावे किए गए?
रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने कई मौकों पर यह आपत्ति दर्ज कराई कि कुछ फैसले उनकी जानकारी या सिफारिश के बिना लिए गए। इनमें मतदाता पंजीकरण फॉर्म में बदलाव, मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया तथा चुनावी डाटाबेस के केंद्रीकरण जैसे मुद्दे शामिल बताए गए हैं।
चुनाव आयोग का पक्ष
चुनाव आयोग ने इन रिपोर्टों पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि किसी भी संस्था के भीतर नोट्स, सुझाव, प्रश्न या अलग-अलग विचार प्रशासनिक प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा होते हैं। आयोग का कहना है कि उसके सभी आदेश और सुधार कानूनी प्रक्रिया तथा निर्धारित नियमों के अनुरूप किए गए हैं।
कुछ अधिकारियों ने यह भी कहा कि विशेष मतदाता सूची संशोधन (SIR) सहित आयोग के निर्णयों को सभी आयुक्तों की स्वीकृति प्राप्त थी और उन्हें निर्धारित प्रक्रिया के तहत लागू किया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया
इस मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने भी सवाल उठाए हैं और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर जवाब मांगा है। दूसरी ओर भाजपा के कुछ नेताओं ने कहा है कि संवैधानिक संस्थाओं के भीतर मतभेद या चर्चा लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा हैं और अंतिम निर्णय सामूहिक प्रक्रिया से लिए जाते हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
चुनाव आयोग देश में चुनाव कराने वाली संवैधानिक संस्था है। ऐसे में उसकी कार्यप्रणाली, पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर उठने वाले सवाल राजनीतिक और लोकतांत्रिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माने जाते हैं। फिलहाल विभिन्न पक्षों की ओर से आयोग से अधिक स्पष्ट और विस्तृत जानकारी सार्वजनिक करने की मांग की जा रही है।








